
आईना वहाँ से जा चुकी थी। शनाया अभी भी ज़मीन पर ही गिरी हुई थी। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन दूसरे ही पल उसने अपने आँसू साफ करते हुए कहा,
“मुझे ऐसा लग रहा था कि मुझे ऐसी हालत में देखकर तुम मुझ पर तरस खाओगी और मेरे साथ तमीज़ से पेश आओगी, लेकिन मैं गलत थी। तुम बहुत ही ज़्यादा घटिया हो। पहले तो तुम थीं ही, लेकिन अब तो तुम हद से ज़्यादा हो चुकी हो। मेरा दिल कर रहा है कि मैं तुम्हारी जान ले लूँ, लेकिन अफ़सोस की बात है कि मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगी, क्योंकि अभी के लिए मुझे अपने बेटे का भरोसा हासिल करना है। बस एक बार उसका भरोसा हासिल कर लूँ, उसके बाद तुम देखना, मैं तुम्हारे साथ क्या-क्या करती हूँ। बहुत शौक है ना मुझे नौकरानी बनाने का? तुम्हें फिर से अपने कदमों में ना गिरा दिया तो मेरा नाम भी शनाया नहीं।”




















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