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अकीरा सीधे अपने कमरे में आई। कमरे में पहुँचकर उसने अपना फ़ोन उठाया और सोचा, "मुझे रूही दीदी की हेल्प करनी होगी। उनके साथ जिस किसी ने भी ज़बरदस्ती की है, उसे जेल जाना ही पड़ेगा। उसे उम्रकैद की सज़ा तो होकर ही रहेगी—उम्रकैद नहीं तो फाँसी तो मैं उसे करवाऊँगी ही, पर मैं उसे ऐसे खुला नहीं छोड़ूँगी। मुझे पता है अभी रूही दीदी कुछ भी कहने की हालत में नहीं हैं, वो बहुत ज़्यादा टूटी हुई हैं। मैं तो इमेजिन भी नहीं कर सकती कि ज़बरदस्ती किस तरह होती है। हालाँकि मेरे साथ भी यही हुआ था और इसका नतीजा आज मैं अपने पेट में लेकर घूम रही हूँ, लेकिन तब मैं नशे में थी, मुझे कुछ भी याद नहीं था। पर उनके साथ तो सामने से ज़बरदस्ती हुई, वो तो पूरे होशो-हवास में थीं। पता नहीं वो बेचारी कैसे बर्दाश्त कर रही होंगी। मुझे किसी से हेल्प लेनी होगी पर किससे?"




















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